सरदारशहर में पिछले 11 में 10 चुनाव जीती कांग्रेस: ‘हाथ’ में 3 वोट बैंक और सहानुभूति, BJP का दावा-अगले साल बदलेगा इतिहास



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जयपुरएक घंटा पहलेलेखक: उपेंद्र शर्मा

सरदारशहर राजस्थान की 200 विधानसभा सीटों में से उन गिनी चुनी सीटों में से एक है, जो कांग्रेस का किला कही जा सकती है। कांग्रेस यहां 2008 को छोड़कर पिछले 10 चुनाव जीती है। साल 2018 में भी यहां दिग्गज नेता भंवरलाल शर्मा जीते थे, जिनका हाल में ही निधन हो गया। उप चुनाव में कांग्रेस ने उनके पुत्र अनिल शर्मा को टिकट दिया और वे जीत गए।

राहुल गांधी की यात्रा की तैयारियों में व्यस्त होने के बावजूद खुद सीएम अशोक गहलोत ने सरदार शहर में मोर्चा संभाला। उन्होंने यहां एक सभा को भी किया।

उपचुनाव से ठीक पहले राहुल गांधी की यात्रा की राजस्थान में एंट्री होने से कांग्रेस पार्टी, सीएम अशोक गहलोत और प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा उसमें व्यस्त हो गए थे। फिर भी भाजपा या रालोपा अपना माहौल वहां नहीं बना सकी। सहानुभूति की लहर तो निश्चित ही थी, लेकिन मतदाताओं के बीच भाजपा की सक्रियता वैसी नहीं थी, जैसी चुनाव जीतने के लिए आवश्यक होती है। रालोपा केवल एक जाति के वोट बैंक के सहारे पार उतरना चाहती थी, लेकिन उसे भी कामयाबी नहीं मिली। त्रिकोणीय संघर्ष होने के बावजूद कांग्रेस ने यह चुनाव जीता है। क्षेत्र में अल्पसंख्यक वोटों की बड़ी संख्या भी कांग्रेस के खाते में गई।

इस सीट पर 70 प्रतिशत से अधिक मतदान होने से मुकाबला रोमांचक बन गया। कांग्रेस के अनिल शर्मा को 91357 वोट मिले, जबकि भाजपा के अशोक पींचा को 64505 वोट मिले। तीसरे नंबर पर रालोपा प्रत्याशी को 46753 मिले। साल 2028 में भंवरलाल शर्मा को 95282 वोट मिले थे और पींचा को 64505 वोट।

क्यों है सरदार शहर कांग्रेस का अभेद्य किला

  • क्षेत्र में भंवरलाल शर्मा की खास कार्यशैली : शर्मा के पास जब भी कोई व्यक्ति अपना काम लेकर जाता था तो वे उसके लिए फोन करने, पत्र लिखने, साथ चलने में फुर्ती दिखाते थे। आने-जाने वाले को चाय-पानी की मनुहार भी करते थे। ऐसे में क्षेत्र में उनके प्रति मतदाताओं में कभी कोई नाराजगी नहीं पनपी। उनका एक खास पॉलिटिकल माहौल था जो अब सहानुभूति में बदल गया।
  • कांग्रेस के तीन खास वोट बैंक : कांग्रेस के राजस्थान में तीन खास वोट बैंक माने जाते हैं। जाट, मुस्लिम और मेघवाल। यह तीनों की ही इस क्षेत्र में क्रमश: आबादी 65 हजार, 20 हजार, 25 हजार हैं। ऐसे में यह क्षेत्र कांग्रेस के लिए बेहद मुफीद बना हुआ है। कांग्रेस प्रत्याशी खुद ब्राह्मण हैं, तो उसे और बड़े वोट बैंक का साथ हमेशा मिलता रहा है।
सरदारशहर में एक रैली के दौरान केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल और प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया। भाजपा के चार दिग्गज यहां जुटे हुए थे, लेकिन उनकी रणनीति विफल रही।

सरदारशहर में एक रैली के दौरान केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल और प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया। भाजपा के चार दिग्गज यहां जुटे हुए थे, लेकिन उनकी रणनीति विफल रही।

पूनिया, मेघवाल, राठौड़ और कस्वा नहीं दिखा सके कमाल

भाजपा की तरफ से इस चुनाव की कमान केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल, प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया, विधायक राजेंद्र राठौड़ व पूर्व सांसद राम सिंह कस्वा के पास थी। पूनिया, राठौड़ व कस्वा का तो चूरू गृह जिला भी है। वे ऐसी कोई रणनीति नहीं बना सके, जिससे मुकाबला कांटे का हो पाता। कोई बड़ी रैली या विशाल जनसभा भी इन नेताओं ने वहां नहीं की। पींचा सरदार शहर से 2008 में जीते थे, लेकिन इसके बाद लगातार 2013, 2018 और अब उप चुनाव 2022 हार गए हैं।

भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया का कहना है कि यह सीट परम्परागत रूप से कांग्रेस ही जीतती आई है। भाजपा यहां केवल एक बार 2008 में ही जीती है। मैं जनता को भाजपा को समर्थन देने के लिए आभार व्यक्त करते हुए कांग्रेस को चेता रहा हूं कि वो गलत फहमी में न रहे। साल 2023 में इस सीट सहित समस्त राजस्थान में उसकी हार तय है।

भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़, वासुदेव देवनानी ने भास्कर को बताया कि सत्तारूढ़ दल कांग्रेस ने सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग कर चुनाव जीता है। सहानुभूति की हवा भी कांग्रेस के पक्ष में थी, हालांकि इस जीत से विधानसभा में भाजपा-कांग्रेस पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

सीएम गहलोत और डोटासरा ने संभाला मोर्चा

राहुल गांधी की यात्रा की तैयारियों में व्यस्त रहने के बावजूद सीएम अशोक गहलोत ने सरदार शहर की गलियों में न केवल घूम-घूम कर खुद प्रचार किया, बल्कि एक विशाल जन सभा भी की। डोटासरा ने छोटी-छोटी बहुत सी सभाएं की और उनमें पंडितजी (भंवरलाल शर्मा का लोकप्रिय नाम) को नाम ले-ले कर लोगों को उनके किए काम गिनाए। कांग्रेस प्रत्याशी अनिल शर्मा की मिलनसार छवि के साथ सहानुभूति की हवा चल पड़ी। डोटासरा ने जाट वोटों को खुद की प्रतिष्ठा से जोड़ते हुए कांग्रेस की तरफ खींचा, जिससे पार्टी को फायदा हुआ।

डोटासरा ने इस जीत के बारे में बताया कि हमें पहले ही ध्यान था। मैंने खुद कहा था कि सरदारशहर भारी मतों से जीतेंगे। यही परिणाम आया है। जनता ने कांग्रेस सरकार की कल्याणकारी योजनाओं पर मुहर लगा दी है। यही आगे 2023 में भी जारी रहेगा।

सरदार शहर में एक रैली के दौरान रालोपा प्रत्याशी का प्रचार करते सांसद हनुमान बेनीवाल। रालोपा तीसरे नम्बर पर रही।

सरदार शहर में एक रैली के दौरान रालोपा प्रत्याशी का प्रचार करते सांसद हनुमान बेनीवाल। रालोपा तीसरे नम्बर पर रही।

रालोपा का कार्ड नहीं चल पाया

रालोपा की सारी रणनीति क्षेत्र में सर्वाधिक वोटों वाले जाट समुदाय के ईर्द-गिर्द ही रही। करीब 40 सालों से भंवरलाल शर्मा की पैठ सरदारशहर की राजनीति में थी, जिसमें सभी समुदायों के मतदाता शामिल थे। ऐसे में रालोपा एक ही वोट बैंक के भरोसे रही, जो उसके लिए नुकसानदायक ही साबित हुआ। अन्य जाति-समुदायों के मतदाताओं में रालोपा को लेकर खास आकर्षण पैदा नहीं हो सका। रालोपा प्रत्याशी लालचंद मूंड को 46753 वोट मिले।

राजस्थान के उप चुनावों में कांग्रेस का पलड़ा भारी

कांग्रेस इस जीत के लिए सरकार की नीतियों को जिम्मेदार बता रही है। अब तक पिछले चार सालों में राजस्थान में खींवसर, मंडावा, धरियावद, सहाड़ा, राजसमंद, सुजानगढ़, वल्लभनगर और सरदार शहर में उप चुनाव हुए। इनमें छह जगहों धरियावद, सहाड़ा, राजसमंद, सुजानगढ़, वल्लभनगर और सरदार शहर विधायक के निधन के कारण उप चुनाव हुए। इनमें से भाजपा को केवल एक राजसमंद में जीत मिली, शेष पांच पर कांग्रेस को जीत मिली। दो सीटों पर विधायक के सांसद बनने पर उप चुनाव हुए थे। यह सीटें थीं मंडावा और खींवसर। इनमें से मंडावा पर कांग्रेस और खींवसर पर रालोपा जीती थी। ऐसे में आठ में से कांग्रेस को सात, रालोपा को एक और भाजपा को एक सीट पर जीत मिली है।

जानें- कौन हैं अनिल शर्मा

सरदारशहर चुनाव एक नजर में

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गुजरात चुनावों में कांग्रेस की बुरी तरह हुई हार ने इस बार 2013 के राजस्थान विधानसभा चुनावों के नतीजों की याद दिला दी है। गुजरात में बुरी तरह हार और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की जीत का राजस्थान कनेक्शन है। इसका राजस्थान कांग्रेस की सियासत पर भी जरूर असर देखने को मिलेगा। पूरी खबर पढ़ें

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