रोजगार के लिए राजस्थान मांग रहा एनसीआर से हिस्सा: केंद्र से मांग: 125 किमी हिस्सा एनसीआर से मुक्त किया जाए, ऐसा हुआ तो निवेश हो सकता है दो गुणा




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जयपुर18 मिनट पहले

राजस्थान सरकार केन्द्र से नेशनल केपिटल रीजन (एनसीआर) से अपना हिस्सा मुक्त करवाना चाहती है। राजस्थान सरकार चाहती है कि एनसीआर दिल्ली से केवल 100 किलोमीटर की दूरी तक ही सीमित रहे। आगे का करीब 100-125 किलोमीटर तक का हिस्सा एनसीआर से मुक्त कर राजस्थान के क्षेत्राधिकार में ही दिया जाना चाहिए।

हाल ही जयपुर में हुई इन्वेस्टमेंट समिट में राजस्थान को 10 लाख करोड़ रुपयों का निवेश और 10 लाख से अधिक लोगों के लिए रोजगार के अवसर मिले हैं। सरकार को इस समिट से पहले और समिट के दौरान उद्यमियों से सरकार को यह फीडबैक मिला है कि अगर एनसीआर से राजस्थान का हिस्सा अलग हो जाए तो यहां निवेश डेढ़ से दो गुणा बढ़ सकता है।

अभी निवेशक इस क्षेत्र में आने से इसलिए हिचकिचाते हैं क्योंकि उन्हें राजस्थान सरकार के साथ केन्द्र सरकार के नियमों का भी पालन करना पड़ता है। केन्द्र सरकार पानी, पर्यावरण और प्रदूषण को लेकर बहुत सख्त है।

ऐसे में राजस्थान सरकार लाखों बेरोजगारों को रोजगार दिलाने के लिए केन्द्र के साथ दो-दो हाथ करने की तैयारी कर रही है। राजस्थान से एक पत्र पहले ही केन्द्र में भेजा चुका है और अब दुबारा एक पत्र उद्योग विभाग भेज कर एक मीटिंग केन्द्र सरकार के अफसरों के साथ करना चाहता है।

केन्द्र फिलहाल इस मुद्दे को टाल रहा है और राजस्थान सरकार को समय नहीं दे रहा है। सूत्रों का कहना है कि जल्द ही उद्योग मंत्री शकुंतला रावत और विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव वीनू गुप्ता स्वयं दिल्ली जाएंगी।

उद्योग मंत्री शकुंतला रावत ने भास्कर को बताया कि एनसीजेड से हम अपना बेशकीमती जमीनी हिस्सा उद्योगों व निवेश के लिए अपने क्षेत्राधिकार में वापस लें इसके लिए हम पूरी कोशिश कर रहे हैं। राजस्थान में हाल ही 10 लाख करोड़ रुपए का निवेश इन्वेस्टमेन्ट समिट में हुआ है, अगर एनसीआर से हमारा इलाका मुक्त हो तो हमारा निवेश डेढ़-दो गुणा तक हो सकता है।

यह क्षेत्र देश-विदेश की नामी कंपनियों की आंखों में बसा हुआ है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की भी यही सोच है कि इस क्षेत्र में उद्यमियों को ज्यादा सुविधाएं और राहत मिले ताकि निवेश और रोजगार के साधन बढ़ सके।

राजस्थान सरकार व कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को जल्द ही राजनीतिक रंग देकर ईआरसीपी (ईस्टर्न राजस्थान कैनाल प्रोजेक्ट) की तर्ज पर मुद्दा भी बनाएगी।

देश के सबसे बेशकीमती इलाकों में शामिल

दिल्ली व हरियाणा से सटा हुआ उत्तर-पूर्वी राजस्थान का यह इलाका देश की सबसे महंगी और बेशकीमती जमीनों से भरा हुआ है। इसमें अलवर, भरतपुर, झुन्झुनूं, सीकर, दौसा जिलों की जमीनें शामिल हैं। यहां उद्योग-धंधे लगाने के लिए निवेशकों को राजस्थान सरकार के साथ केन्द्र सरकार के नियमों का भी पालन करना पड़ता है।

निवेशकों के लिए राजस्थान के नियमों का पालन करना ज्यादा आसान है। इसी क्षेत्र से दिल्ली-मुम्बई फ्रेट कॉरिडोर, चार बड़े नेशनल हाइवे, दिल्ली-मुम्बई, दिल्ली-अहमदाबाद, दिल्ली-भोपाल, जयपुर-कोलकाता, जयपुर-पटना, जयपुर-चंडीगढ़ जैसी रेल लाइंस भी गुजरती हैं।

इस इलाके से महज 100 किलोमीटर दूरी पर दिल्ली, जयपुर, आगरा के हवाई अड्‌डे हैं और अलवर जिले में एक नया एयरपोर्ट भी प्रस्तावित है। यह इलाका अपने सुगम नेशनल हाइवे और रेल सुविधा के कारण कांडला (गुजरात), भावनगर (गुजरात), मुम्बई (महाराष्ट्र), कोचीन (केरल), विशाखापत्तनम (आंध्रप्रदेश), चेन्नई (तमिलनाडू) जैसे बंदरगाहों से भी सीधा जुड़ा हुआ है।

यहां से वहां तक की दूरी 24 घंटों से कम समय में तय की जा सकती है। ऐसे में यहां बनने वाले माल, उत्पादन, चीजों को विदेश निर्यात करना भी मुश्किल नहीं है।

यह चाहती है राजस्थान सरकार

इसके तहत राजस्थान सरकार चाहती है कि दिल्ली से 100 किलोमीटर तक ही एनसीजेड सीमित रहे। उसके आगे के इलाके में उद्योगों की स्थापना, संचालन व नियमन आदि में केवल राजस्थान सरकार के नीति नियम लागू हों। ऐसा कई औद्योगिक समूहों से प्राप्त फीडबैक के बाद किया गया है।

राजस्थान की मांग है कि ऐसा होने पर भरतपुर, दौसा, सीकर, वैर, भुसावर, बानसूर, कोटकासिम, झुंझुनूं, अलवर आदि में स्थापित होने वाले उद्योगों को बड़ी राहत मिल सकेगी। चूंकि यह इलाके देश के सबसे महंगे इलाकों में शामिल हैं, ऐसे में यहां उद्योग लगाना हर निवेशक और उद्योगपति को पसंद है, लेकिन यहां पर पानी, बिजली, प्रदूषण, पर्यावरण, पर्यावरण, खनन के संबंध में बहुत से नियम केंद्र सरकार के लागू होते हैं। ऐसे में निवेशक इस इलाके में आने से बचना चाहते हैं।

टाल रहा केन्द्र

केन्द्र सरकार फिलहाल राजस्थान की इस मांग के सन्दर्भ में कोई सुनवाई करने के मूड में नहीं लग रही। राजस्थान सरकार ने गत दिनों इन्वेस्टमेन्ट समिट से ठीक पहले भी केन्द्र सरकार के समक्ष बैठक करना चाहती थी। बैठक सितम्बर में तय भी हुई, लेकिन फिर ऐन मौके पर केन्द्र की तरफ से टाल दी गई। केन्द्र व राज्य के स्तर पर चूंकि अलग-अलग राजनीतिक पार्टी की सरकारें हैं, ऐसे में राजस्थान के पक्ष में कोई निर्णय होना बहुत मुश्किल नजर आता है।

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