भीलवाड़ा में जातीय पंचायत बना रही लड़कियों को गुलाम: स्टाम्प पेपर पर बेची जाती हैं लड़कियां, नहीं बेचने पर मां से दुष्कर्म



भीलवाड़ाएक घंटा पहलेलेखक: विक्रम सिंह सोलंकी और रणवीर चौधरी

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जातीय पंचायत में स्टाम्प पेपर पर लड़कियों का सौदा किया जाता है।

सीरिया-इराक में जिस तरह आईएस मासूम लड़कियों को ‘गुलाम’ बना रहा है, वैसा ही घिनौना जुर्म राजस्थान के आधा दर्जन जिलों में जातीय पंच कर रहे हैं। 8 से 18 साल की लड़कियों को नीलामी कर बेचा जा रहा है। यूपी, मप्र, मुंबई, दिल्ली और विदेश तक भेजा जा रहा है। भास्कर टीम जयपुर से करीब 340 किमी का सफर करके भीलवाड़ा के पंडेर गांव पहुंची। यहां कई बस्तियों में गरीब परिवारों की लड़कियों को दलाल स्टाम्प पेपर पर खरीदकर बेच देते हैं। बस्तियों में जाकर लोगों से बात करने पर हैरान कर देने वाली सच्चाई सामने आई।

जातीय पंचायत की सताई एक लड़की ने आपबीती बताते हुए कहा कि जब मैं 21 साल की थी, तब मुझे बंधक बनाया गया। जब भी भागने की कोशिश की, पकड़ी गई। एक बार भागते हुए पकड़ी गई तो तब तक मेरे साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया, जब तक मैं बेहोश नहीं हो गई। हर दिन मौत से बदतर मंजर देखने को मिला था। हद तो यह है कि ये सारे फैसले पंचायत के दबाव में किए जाते हैं।

भीलवाड़ा में कई बस्तियों में आज भी दो पक्षों के बीच विवाद या झगड़ा हो तो पुलिस के पास नहीं जाते। विवाद निपटाने के लिए जातीय पंचायत बैठाई जाती है। यहीं से लड़कियों को गुलाम बनाने का खेल शुरू होता है। और तो और नहीं बेचने पर उनकी मां से बर्बरता की जाती है।

केस 1 | 15 लाख के कर्ज के लिए बुआ-बहनों को बेच दिया
पंडेर गांव की कविता (बदला नाम) के पिता पर जातीय पंचायत के कारण 15 लाख रुपए का कर्ज हो गया। कर्ज उतारने के लिए पिता ने सबसे पहले मेरी बुआ को बेचा था। इसके बाद मेरी तीन बड़ी बहनों को बेच दिया था। इसके बाद भी कर्ज नहीं उतरा तो मुझे भी बेच दिया। उस समय मेरी उम्र 12 साल थी। मुझे खरीदार ने 8 लाख रुपए में 15 साल के लिए खरीदा था। खरीदार मुझे मप्र ले गया। जिंदगी नर्क हो गई थी। हम पांचों बहनें गुलाम बन गईं, लेकिन आज भी पिता का कर्ज नहीं उतरा है।

केस 2 | तीन बार बेचा गया, 4 बार अबॉर्शन; जिंदगी नर्क बनी
12 साल की गायत्री ने बचपन में ही मां को खो दिया, उनके इलाज में इतना कर्जा हुआ कि पिता को घर बेचना पड़ा। दादी बीमार हुई तो पिता पर 6 लाख का कर्जा और चढ़ गया। पिता मजदूरी के कारण घर से बाहर ही रहते थे। दादी मुझसे घर का काम कराती और मारपीट करती। फिर कुछ लोग मुझे खरीदकर जयपुर, आगरा ले गए। रोज गलत काम करवाते। फिर दिल्ली में 6 लाख रुपए में बेच दिया। मुझे तीन बार बेचा गया और चार बार प्रेग्नेंट हुई। दबाव में आकर मैं आखिरकार एक लड़के के साथ चली गई।

गांवों में नजर नहीं आईं बेटियां…

पंचायत से जुड़े एजेंटों ने गांव में आलीशान कोठियां बनवा रखी हैं। उनके खौफ के सामने कोई पुलिस और प्रशासन के सामने बोलने की हिम्मत नहीं करता है। भास्कर टीम पंडेर, जहाजपुरा, मांडलगढ़ के कई गांवों में पीड़ित परिवारों से मिली। घरों में कर्ज से लदे मां-बाप थे, लेकिन बेटियां नहीं थीं।

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