बच्चे की तरह होता है फाइटर प्लेन का नामकरण: सबसे पहले फ्रांस के फाइटर जेट को दिया था ‘तूफानी’ नाम



जोधपुर31 मिनट पहले

3 अक्टूबर को लाइट कॉम्बैक्ट हेलिकॉप्टर को एयरफोर्स में शामिल किया गया। इस LCH को प्रचंड नाम दिया गया। इसके बाद से यह चर्चा हो रही है कि आखिर इन फाइटर जेट और लड़ाकू हेलिकॉप्टर के नाम कैसे रखे जाते हैं।

आपको जानकार हैरानी होगी कि बच्चों की तरह एयरफोर्स इनका नामकरण करती है। नाम के लिए जेट या हेलिकॉप्टर की क्षमता और विशेषता पर ध्यान दिया जाता है।

एयरफोर्स डे पर पढ़े आखिर निकनेम रखने की शुरुआत कहां से और कैसे हुई…

हरिकैन बन गया तूफान

एयरफोर्स में विमानों का निकनेम रखने की शुरुआत वर्ष 1954 में हुई। वर्ष 1953 में भारत ने फ्रांस से एमडी 450 औरेगन फाइटर जेट खरीदे। फाइटर जेट का निकनेम रखने का कारण यह था कि फ्रांस के इस जेट के नाम को बोलने में पायलट्स को दिक्कतें हो रही थी। इसे ध्यान में रख इसका भारतीय नामकरण तूफानी कर दिया गया।

फ्रेंच भाषा में इसके मूल नाम का अर्थ भी हरिकैन यानि तूफान ही था। इसके बाद यह परम्परा बन गई और सभी विमानों का नामकरण शुरू हो गया था।

इसके बाद कई फाइटर जेट और हेलिकॉप्टर्स को नाम दिए गए, लेकिन, 25 साल पहले सुखोई खरीदने के साथ यही परम्परा बंद कर दी गई थी।

कमेटी तय करती है नाम

परिवार में किसी नए सदस्य के जन्म लेने पर उसके नाम को लेकर सभी रिश्तेदारों में उत्सुकता रहती है। उसी तर्ज पर एयरफोर्स में भी किसी नए फाइटर प्लेन या हेलिकॉप्टर के शामिल होने पर उसके भारतीय नाम को लेकर हमेशा से उत्सुकता रही है। नामकरण के लिए बाकायदा एक कमेटी बनाई जाती है।

इसमें एयरफोर्स के 3 से 5 अधिकारी रहते हैं। ये कमेटी फाइटर जेट की खासियत के अनुसार देश के प्रसिद्ध स्थानों, पौराणिक पात्रों के नाम को ढूंढती है और इस पर डिस्कशन किया जाता है।

आखिर नाम सिलेक्शन होने के बाद यह फाइल एयर चीफ को भेजी जाती है और वे ही इसे अंतिम रूप देते हैं। कई बार नाम के सिलेक्शन को लेकर रक्षा मंत्रालय तक भी चर्चा होती है और इसके बाद यह नाम फाइनल किए जाते हैं।

1997 में बंद हो गई थी यह परंपरा

विमानों के नामकरण का सिलसिला वर्ष 1997 में सुखोई खरीदे जाने तक जारी रहा। इसके बाद विदेश से खरीदे विमानों या हेलिकॉप्टरों का नामकरण बंद कर दिया गया। अब सिर्फ स्वदेशी उत्पादों का ही नामकरण किया जाता है। इसके पीछे एयर फोर्स का तर्क था कि विदेशी विमान व हेलिकॉप्टरों की पहचान उनके मूल नाम से ही होती है।

वहीं अन्य देशों के साथ युद्धाभ्यास के दौरान विदेशी पायलट्स को इन विदेशी फाइटरर्स के नए नाम से समझने में परेशानी होती है। इस कारण ने नामकरण पर रोक लग गई। सुखोई के बाद लॉकहिड मार्टिन के सी-130, बोइंग सी-17 ग्लोबमास्टर, अपाचे व चिनूक हेलिकॉप्टर व राफेल फाइटर जेट का नामकरण नहीं किया गया।

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