दीपावली रियासत काल वाली: तोपों से होता था स्वागत, 15 दिन पहले से मनाते थे दीपोत्सव



झालावाड़एक घंटा पहले

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झालावाड़ में रियासतकाल में दीपावली पर संस्कृति और परम्परा के बीच महापर्व के उल्लास का अलग ही रंग देखने को मिलते थे।

झालावाड़ में रियासतकाल में दीपावली पर संस्कृति और परम्परा के बीच महापर्व के उल्लास का अलग ही रंग देखने को मिलते थे। उस दौरान लोग 15 दिन पहले से ही दीपावली के कई कार्यक्रमों का आनंद उठाते थे। आम लोग चूना, पाण्डू, खड़ी से अपने आवासों को चमकाते थे। महिलाएं उन पर सुन्दर कलात्मक और परम्परागत चित्रकारी करती थीं।

दीपावली का उत्सव 5 दिन तक पूरे उत्साह से मनाया जाता था। बृजनगर (वर्तमान झालावाड़ शहर) में कोकबाण, चकरी, पटाखे, रज्जब अली, तोरली, मोहम्मद अली बोहरा की दुकानों पर मिलते थे। दीपावली की रात को कच्चे-पक्के प्रत्येक मकान और दुकानें मिट्टी के दीपों से जगमगा उठते थे। पूरी रात दीपावली के पटाखों से आकाश गूंजता था। देवी लक्ष्मी की पूजा परम्परागत रीति रिवाजों से की जाती थी। व्यापारी वर्ग आधी रात के समय अपने प्रतिष्ठान पर परिवार सहित लक्ष्मी की पूजा, अपने बही खाते के साथ करके समृद्धि की कामना करते थे। दीपकों की सुनहरी रोशनी में गढ़भवन अयोध्या के राजभवन के समान स्वर्णिम और वैभव युक्त हो उठता था। गढ़ भवन परिसर में गढडे खोदकर उनमें बांस लगाए जाते थे। बांसों पर मिट्टी के दीपकों की कतार को बड़ी कुशलता से सजाया जाता था। उसमें तेल डाल कर दीपावली की जलाया जाता था। उस समय भवन के सुंदर, आलीशान व विशाल कक्षों को आमजन के अवलोकनार्थ खोला जाता था। इसमें सजी शाही व बहुमूल्यवान कलाकृतियों, शस्त्रों आदि का आमजन परिवार सहित अवलोकन करते थे।

तोप चलाकर होता था आगाज
दीपावली पर शहर के गांवड़ी के तालाब के पास स्थित चांदमारी स्थान से राज परिवार की ओर से तोपखाने की गर्जना वाली तोपें चलाई जाती थी जो दीपावली के स्वागत का प्रतीक होती थी। तोपों की गूंज से पूरा नगर पूजा अर्चना शुरू करता और दीपावली का स्वागत कर प्रसन्नता और उल्लास के साथ इसे परम्परागत रुप से मनाता था। आम व्यक्ति और उसका पूरा परिवार परम्परागत तरीके से अपने मकानों को सजाता था और शाम को देवी लक्ष्मी का पूरी आस्था के साथ पूजन करता था। दीपावली के दूसरे दिन वह अपने पड़ोसियों से मिलता था।

दुकानदारों को किया जाता था पुरस्कृत
तत्कालीन महाराज राणा भवानी सिंह जनता के बीच जाकर उत्साह से दीवाली मनाते थे। दीपावली के मौके पर झालरापाटन नगर में भ्रमण करते थे और साहूकारों के दुकानों पर सजी दीपावली की रोशनी और भव्यता का अवलोकन करते थे। जिसके बाद दुकानदारों को पुरस्कृत भी किया जाता था।

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