‘ट्राइएज प्रोटोकॉल’ की अनदेखी: हर साल जयपुर में बचा सकते हैं 150 जानें मगर जिम्मेदार गंभीर नहीं, योजना सिर्फ कागजों में



जयपुर19 मिनट पहलेलेखक: नरेश वशिष्ठ / सुरेन्द्र स्वामी

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सड़क हादसों में घायलों की जान बचाने के लिए सरकार की ओर से शुरू की गई ट्राइएज प्रोटोकॉल अस्पताल प्रशासन की लापरवाही की वजह से फेल साबित हो रही है। योजना के तहत अस्पताल में आने वाले घायलों की गंभीरता को देखते हुए लाल, पीला, हरा व काला बैंड बांधा जाना था।

बैंड के हिसाब से ही डाक्टरों का इलाज करना था, ताकि गंभीर घायल व्यक्ति को समय पर इलाज मिलने से जान बचाई जा सके। भास्कर ने सरकार की ट्राइएज योजना के बारे में राजधानी के चार से अधिक अस्पतालों का जायजा लिया तो पड़ताल में सामने आया कि किसी भी अस्पताल में ट्राइएज प्रोटोकॉल की पालना नहीं हो रही। सामान्य और गंभीर मरीजाें का एक ही तर्ज पर इलाज किया जा रहा है।

पड़ताल में सामने आया कि एसएमएस और जयपुरिया अस्पताल में सड़क दुर्घटना में घायल गंभीर व्यक्ति का भी उसी तरह इलाज किया जा रहा था, जिस तरह सामान्य घायल का किया जाता है। यहां गंभीर घायल व्यक्ति के परिजन का आने का इंतजार किया जाता। परिजन के माध्यम से ही दवाइयां, जांच और अन्य व्यवस्था की जाती है। परिजन काे खून चढ़ाने के बदले में खून दान करना पड़ता है।

प्रदेश में 57 ट्रोमा सेन्टर
जयपुर समेत विभिन्न जिलों में 57 ट्रॉमा हैं। इनमें साल में 22 हजार से अधिक घायल आते हैं। एसएमएस, जयपुरिया, कावंटिया, चौमूं, दूदू, शाहपुरा, कोटपूतली में हर साल 2200 घायल आते हैं। हर साल 933 लोगों की मौत हो जाती है। घायलों का ट्राइएज के तहत इलाज किया जाए तो 933 में से 150 से अधिक लोगों की जान बचाई जा सकती है।

हर साल दुर्घटना, घायल और मौत
वर्ष दुर्घटना घायल मौत

2019 23480 22979 10523
2020 19114 16769 9250
2021 20951 19344 10043

फंड मिला, पर ट्रोमा बनने का इंतजार
घायलों काे नजदीकी अस्पताल में तुरंत इलाज मिलने के लिए परिवहन एवं सड़क सुरक्षा विभाग ने शास्त्री नगर स्थित कांवटिया अस्पताल में ट्राॅमा सेंटर बनाने के लिए 5 कराेड़ रुपए स्वीकृत किए थे, लेकिन अभी तक काम शुरू नहीं हुअा। सिविल वर्क व उपकरणों तक नहीं खरीदे हैं। ट्रोमा सेन्टर नहीं बनने से गंभीर मरीजों को एसएमएस रैफर करना पड़ रहा है। इसकी दूरी करीब 10 किमी है। ऐसे में रास्ते में कई गंभीर मरीज दम ताेड़ देते हैं।

ट्राइएज प्रोटोकॉल: इमरजेंसी में समय नहीं लगे

  • मरीजों को उपलब्ध संसाधनों का उनकी स्थिति के अनुसार उपयोग व बेशकीमती संसाधनों का उपयोग कर चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराना है। समय पर इलाज मिलने पर जीवन को बचाया जा सकें। इमरजेंसी के दौरान ट्राइएज के लिए आवश्यक ज्यादा समय नहीं लगाएं।
  • ट्राइएज स्टेशन पर 24 घंटे 7 दिन ट्राली, व्हीलचेयर, ट्रालीमैन, डॉक्टर व नर्सेज स्टाफ की उपलब्धता।
  • गंभीरता की पहचान कर लाल, पीला, हरा व काला बैंड। उसके हिसाब से एरिया व बैड की उपलब्धता।
  • मरीजों का रिकाॅर्ड मेंटेन रखना। रोजाना की रिपोर्ट संबंधित संस्थान के अधिकृत अधिकारी को भेजना।
  • कैटेगरी 1. लाल ( जिनका इलाज कम से कम समय में किया जा सकता है।), 2.पीला ( साधारण देखभाल घंटों के भीतर मिलने पर जीवन को बचाया जा सकता है), 3. हरा (मामूली चोट वाले मरीज के इलाज में देरी हो सकती है। जब तक कि अन्य श्रेणियों के मरीजों का इलाज नहीं किया जाता है), 4.काला ( मृत मरीज)

ट्राइएज शुरू करने का उद्देश्य गंभीर घायल व्यक्ति को समय रहते हुए इलाज मिल सके। अगर अस्पताल इस गंभीरता से नहीं ले रहे तो उच्च अधिकारियों को अवगत कराया जाएगा। इसके बाद संबंधित विभाग को पत्र लिखा जाएगा।-निधी सिंह, संयुक्त परिवहन आयुक्त (सड़क सुरक्षा)

अस्पतालों में ट्राइएज की पालना के लिए पत्र लिखा गया है। मरीजों की स्थिति के आधार पर इलाज का चयन करने पर मौत के मुंह में जाने वालों के जीवन बचाया जा सकता है। -डॉ.एस.के.परमार, अतिरिक्त निदेशक (चिकित्सा प्रशासन)

ट्राइएज के जरिए अस्पताल में आने वाले घायलों का कैटेगरी के अनुसार प्रॉपर तरीका से चयन कर इलाज करने पर जीवन को बचाया जा सकता है। -डॉ.एस.के.परमार, अतिरिक्त निदेशक (चिकित्सा प्रशासन)

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