कैंसर मरीजों का बढ़ता जख्म: ब्रेकी थैरेपी मशीन पर लगा ब्रेक, 2 माह से मरीजों को इलाज का इंतजार



जयपुर26 मिनट पहलेलेखक: सुरेन्द्र स्वामी

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सरकार की ओर से अस्पतालों के आउटडोर, इनडोर में आने वाले मरीजों की निशुल्क दवा व जांच के दावे फेल साबित हो रहे है।

सरकार की ओर से अस्पतालों के आउटडोर, इनडोर में आने वाले मरीजों की निशुल्क दवा व जांच के दावे फेल साबित हो रहे है। ऐसे में सरकार की संचालित निशुल्क योजना पर सवाल उठने लगे है। एसएमएस अस्पताल में मुंह, बच्चेदानी, प्रोस्टेट, गला, जीभ व गाल जैसे कैंसर से पीड़ित मरीजों को अब बेहोश करके यानी जनरल एनेस्थेसिया के जरिए इलाज की ब्रेकी थैरेपी मशीन दो माह से बंद पड़ी है।

मशीन बंद होने का कारण मरीज को लिटाई जाने वाली टेबल, मॉनिटर और वायरिंग का इश्यू माना जा रहा है। अस्पताल प्रशासन की लापरवाही से मरीजों पर खतरा मंडरा रहा है। मरीजों को निजी अस्पतालों की शरण में जाना पड़ रहा है। निजी में एक सीटिंग के लिए 8 से 10 हजार रुपए खर्च करने को मजबूर है।

इसमें साइड इफेक्ट का खतरा नहीं

  • यह एक ऐसी तकनीक है, जिससे ट्यूमर के अलावा किसी और अंग के साइड इफेक्ट होने का खतरा नहीं रहता। मरीज के शरीर पर रेडिएशन का दुष्प्रभाव कम पड़ता है। ब्रेकी थेरेपी के पहले कोबाल्ट मशीन से कैंसर के मरीजों के शरीर के बाहरी हिस्से को सिकाई कर जख्म ठीक किया जाता है। उसके बाद शरीर के अंदर जख्मों के लिए ‘ब्रेकी थेरपी’ का उपयोग किया जाता है।
  • गर्भाशय, मुंह के जख्मों की सिकाई के लिए ‘ब्रेकी थेरपी’ मशीन का उपयोग होता है। लेकिन मशीन बंद होने से कैंसर मरीजों के शरीर के अंदर जख्म बढ़ने का खतरा बढ़ गया है।
  • शरीर के बाहरी हिस्से का उपचार तो कोबाल्ट मशीन से हो रहा है, लेकिन ब्रेकी थेरेपी से वंचित हैं। कोबाल्ट मशीन से उपचार के बाद मरीजों को अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है।

“ब्रेकी थैरेपी मशीन तकनीकी कारणों से बंद पड़ी हुई है। कुछ इश्यू के कारणों से कंपनी वाले से भी वार्ता जारी है। जल्द ही मरीजों को सुविधा मिलने लगेगी।”
-डॉ.अचल शर्मा, अधीक्षक, एसएमएस अस्पताल

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