केर सागर तालाब के किनारे स्थित है सोमदेव आश्रम: आज भरेगा मेला, मध्य रात्रि में होगी सोमदेव महाराज की आरती



प्रतापगढ़ (राजस्थान)3 घंटे पहले

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जिला मुख्यालय उदयपुर से 100 किमी दूर कूण कस्बे में केर सागर तालाब के किनारे स्थित सोमदेव आश्रम चमत्कारिक माना जाता है। प्राचीन काल में आश्रम के नाम जाना जाता था, जो बाद में सोमदेव आश्रम के नाम से जाना गया। प्राचीन काल में आश्रम में कई साधु-संत रहा करते थे। आश्रम में बारह माह तक साधु-सन्तों का आवागमन होता रहता था। शरद पूर्णिमा के दिन क्षेत्र व आसपास के 24 गांव के श्रद्धालु आते थे। शाम को श्रद्धालु व साधु-सन्तों के लिए भोजन की व्यवस्था आश्रम की तरफ से रहती थी। आश्रम में एक एक सिद्ध संत थे, जिनका नाम था सोमदेव महाराज। एक बार रात में भोजन बन रहा था तो आश्रम में घी खत्म हो गया। सभी संत व श्रद्धालु चिंतित हो गए। संत सोमदेव महाराज के पास गए। बताया कि घी खत्म हो गया है और अभी रात है तो क्या करें। संत ने कहा कि केर सागर तालाब से जितना घी चाहिए हो उतने डिब्बे पानी उधार ले लो और सुबह वापस जितने डिब्बे पानी के लिए उतने घी के डिब्बे केर सागर तालाब में डाल देना। केर सागर तालाब का पानी उस समय भोजन में घी का काम कर गया। बुजुर्ग ग्रामीणों के अनुसार संत सोमदेव महाराज के एक शिष्य थे, जो उनकी सेवा करते थे। उनका नाम पूरणमल था। वो कूण के पास के थे। संत ने पूरणमल को तपस्या करने के लिए सलूंबर के निकट सराड़ी भेजा। पूरणमल ने तपस्या की और सिद्धि प्राप्त की। उन्होंने एक शिष्य बनाया, जो उनकी नित्य सेवा करता था। उनके शिष्य के एक बेटा था। शिष्य के बेटे की मृत्यु का समय आ गया जिसका पूरणमल को पता चला। उन्होंने शिष्य को कहा तेरे बेटे को उस दिन मेरे पास ले आना। शिष्य ने पूछा क्या बात है तो महाराज ने कहा कि बाद में बताऊंगा, पहले तेरे बेटे को लेकर आना। शिष्य निश्चित समय पर अपने बेटे को पूरणमल के पास लेकर जा रहा था, परन्तु कुछ क्षण की देरी हो गई। तब बिजली गिरी तो पूरणमल ने अपना एक हाथ लम्बा किया, जिससे पूरणमल का हाथ जल गया व शिष्य का बेटा बच गया। बाद में शिष्य को कहा, तूने देरी कर दी, जिससे मुझे मेरे हाथ पर बिजली लेनी पड़ी। यहां पर हर वर्ष शरद पूर्णिमा को मेला लगता है व मध्यरात्रि को संत सोमदेव महाराज की भव्य आरती होती है।

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