कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएट, मशरूम किंग के नाम से पॉपुलर: पिता नहीं चाहते थे किसान बने; आज 20 लाख से ज्यादा की कमाई



जोधपुर29 मिनट पहलेलेखक: अरविंद सिंह

हिमालय पर उगने वाले गुच्छी मशरूम प्रधानमंत्री मोदी को बेहद पसंद हैं। ये वही मशरूम हैं जिन्हें लेकर काफी सियासी चर्चाएं हुईं। इस चर्चा ने लोगों का ध्यान मशरूम की तरफ खींचा। आज हम आपको उस युवा किसान के बारे में बता रहे हैं जिसने कंप्यूटर साइंस पढ़ा, सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनकर नौकरी कर सकता था, लेकिन जड़ों से जुड़ने के लिए वह किसानी के नए सिरे खोजने निकल पड़ा और उसे मिला मशरूम। म्हारे देस की खेती में आज बात मशरूम किंग जितेंद्र सांखला की…

उम्र – 27 साल

शिक्षा – कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएट

व्यवसाय – मशरूम खेती

सालाना उत्पादन – 5000 किलो

जोधपुर जिले के चौखा गांव के युवा किसान हैं जितेंद्र सांखला। इलाके में लोग उन्हें मशरूम किसान के नाम से जानते हैं। 27 साल के जितेंद्र चाहते तो किसी अच्छी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन सकते थे, लेकिन उन्होंने चुना खेती का रास्ता।

मशरूम की खेती करते उन्हें महज 3 साल हुए हैं और उन्होंने मशरूम के उत्पादन को 5 टन (5 हजार किलो) तक पहुंचा दिया है। कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएट किसान जितेंद्र का मशरूम की खेती करना उनकी अपनी चॉइस थी।

जितेंद्र ने अपने फार्महाउस पर यह शेड बना रहा है। इसमें वे बैग्स में मशरूम उगाते हैं। सबसे बड़ी बात, मशरूम की अच्छी उपज के लिए तापमान को मेंटेन करना और अनुकूल वातावरण तैयार करना जरूरी है। तीन साल में जितेंद्र मशरूम की अच्छी खासी उपज लेने लगे हैं।

जितेंद्र ने अपने फार्महाउस पर यह शेड बना रहा है। इसमें वे बैग्स में मशरूम उगाते हैं। सबसे बड़ी बात, मशरूम की अच्छी उपज के लिए तापमान को मेंटेन करना और अनुकूल वातावरण तैयार करना जरूरी है। तीन साल में जितेंद्र मशरूम की अच्छी खासी उपज लेने लगे हैं।

पिता चाहते थे कि बेटा नौकरी करे
जितेंद्र सांखला के पिता संतोष सिंह सांखला परंपरागत खेती किसानी करते रहे। मां लूणी देवी भी खेत में पिता का हाथ बंटाती थी। माता-पिता ने यह सोचकर अपने दो बेटों और दो बेटियों को खेती-किसानी पर निर्भर होने से रोका, कि यह घाटे का सौदा है। जितेंद्र के बड़े भाई गुजरात में एसबीआई बैंक में मैनेजर हैं।

यह ऑयस्टर मशरूम की पिंक वैरायटी है। मार्केट की इसकी अच्छी डिमांड है। पिंक मशरूम के अलावा जितेंद्र अपने फार्म हाउस पर 8 तरह के मशरूम उगाते हैं।

यह ऑयस्टर मशरूम की पिंक वैरायटी है। मार्केट की इसकी अच्छी डिमांड है। पिंक मशरूम के अलावा जितेंद्र अपने फार्म हाउस पर 8 तरह के मशरूम उगाते हैं।

छोटे बेटे जितेंद्र के लिए भी पिता संतोष सिंह यही चाहते थे कि वह भी अच्छी पढ़ाई करे और नौकरी करें। साल 2010 में गांव चौखा से 10वीं करने के बाद जितेंद्र ने 12वीं जोधपुर के महेश स्कूल से कॉमर्स सब्जेक्ट में पास की। इसके बाद जोधपुर के लाचू स्थित कॉलेज से कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएशन किया। जितेंद्र ने साल 2016 में एमबीए करने की प्लानिंग की, लेकिन सफल नहीं हुए।

पहला प्रोडक्शन सिर्फ 100 ग्राम मिला, मैं हताश नहीं हुआ
जितेंद्र ने बताया कि जब कैट का रिजल्ट आया तो मैं निराश नहीं हुआ। रिजल्ट ने मेरा काम आसान कर दिया। अब तक मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने के सपने देख रहा था लेकिन मैंने वही करना तय किया, जिसका अभ्यास मुझे बचपन से था। मैंने खेती में करियर बनाने के लिए मन पक्का कर लिया।

कैट का रिजल्ट आने के बाद 2019 में मैंने मशरूम की खेती के लिए जानकारी जुटाना शुरू कर दिया। शुरू में जैसी भी नॉलेज मिली, वैसे ही मैंने मशरूम प्रोडक्शन का काम शुरू किया। 2019 का अक्टूबर महीना था। हल्की ठंड पड़ने लगी थी। मशरूम की खेती के लिए यह आदर्श है। मैंने घर के एक हिस्से में 20 बैग में मशरूम उगाए।

जितेंद्र ने बताया कि मशरूम के बीज आसानी से नहीं मिलते। बीज दिल्ली या उदयपुर से लाने पड़ते थे। इसलिए फार्म हाउस में ही सेल्फ स्पॉन यूनिट भी तैयार की। इस यूनिट में कई तरह के मशरूम के बीजे तैयार होते हैं।

जितेंद्र ने बताया कि मशरूम के बीज आसानी से नहीं मिलते। बीज दिल्ली या उदयपुर से लाने पड़ते थे। इसलिए फार्म हाउस में ही सेल्फ स्पॉन यूनिट भी तैयार की। इस यूनिट में कई तरह के मशरूम के बीजे तैयार होते हैं।

20 बैग से पहली उपज मिली सिर्फ 100 ग्राम मशरूम। मैंने इसके बारे में किसी से ज्यादा जिक्र नहीं किया क्योंकि मैं सीखने के दौर में था। दूसरी बार भी प्रोडक्शन न के बराबर ही रहा। रिजल्ट देखकर घर वाले सलाह देने लगे थे कि मशरूम की खेती का सपना छोड़कर कहीं नौकरी कर लूं।

मैंने परिवार से एक मौका और मांगा। इसके बाद मैंने मशरूम की खेती को लेकर इंटरनेट खंगाला। घंटों जानकारी जुटाता रहता। मशरूम की खेती कर रहे कुछ किसानों से बात की। पता चला कि मशरूम के लिए सबसे जरूरी है अनुकूल वातावरण।

मशरूम की बीज तैयार करने के लिए जितेंद्र ने यूनिट लगा ली है। यूनिट से तैयार बीज वे किसानों को देते हैं।

मशरूम की बीज तैयार करने के लिए जितेंद्र ने यूनिट लगा ली है। यूनिट से तैयार बीज वे किसानों को देते हैं।

इसके बाद मैंने फार्म हाउस पर एक रूम अलग से तैयार किया, जिसे मशरूम की खेती के लिए अनुकूल बनाया। इसमें मैंने 40 बैग मशरूम उगाए। कुछ दिन की मेहनत के बाद मशरूम रेडी हो गए। बाजार में भी अच्छा रेस्पॉन्स मिली और मेरा सफर शुरू हो गया।

दूसरी बार मैंने 100 बैग के साथ मशरूम उगाए। मशरूम की खेती का मुझे 3 साल का अनुभव है। यह अनुभव कम है, लेकिन अब सालाना 4 से 5 हजार किलो मशरूम की उपज ले रहा हूं। अब किसान मेरे फार्म हाउस पर मशरूम की खेती सीखने आते हैं।

यह बटन मशरूम है। इसकी आकृति कोट के बटन की तरह होती है इसलिए इसे बटन मशरूम कहते हैं। जितेंद्र के फार्म पर बटन मशरूम की मिल्की वैरायटी मिलती है।

यह बटन मशरूम है। इसकी आकृति कोट के बटन की तरह होती है इसलिए इसे बटन मशरूम कहते हैं। जितेंद्र के फार्म पर बटन मशरूम की मिल्की वैरायटी मिलती है।

ऑयस्टर मशरूम की लाइफ साइकिल 50 दिन होती है। बटन की 90 दिन इसके बाद बैग बदलकर नई कम्पोस्ट तैयार की जाती है। बटन मशरूम के एक बैग में 10 किलो कम्पोस्ट लगती है। इसमें दो से ढाई किलो तक प्रति बैग मशरूम लिए जा सकते हैं। ऑयस्टर मशरूम का बैग 3 से 4 किलो तक का होता है। इसके एक बैग से 700 से 800 ग्राम तक मशरूम मिल जाते हैं।

जितेंद्र के पास 20 बीघा की खेती है। मशरूम ऐसी फसल है जिसे आमतौर पर बैग्स में लटकाकर उपजाया जाता है। ऐसे में इसे खेतों की जरूरत नहीं होती। जितेंद्र मशरूम के साथ-साथ खेतों में मौसम के अनुसार फसल और सब्जियों का उत्पादन भी करते हैं। खेत में गेहूं, फूल गोभी, मिर्च और सब्जियों की खेती कर रहे हैं। इसके अलावा लेसुआ के 40 पेड़ भी लगे हैं।

जितेंद्र के पास 20 बीघा की खेती है। मशरूम ऐसी फसल है जिसे आमतौर पर बैग्स में लटकाकर उपजाया जाता है। ऐसे में इसे खेतों की जरूरत नहीं होती। जितेंद्र मशरूम के साथ-साथ खेतों में मौसम के अनुसार फसल और सब्जियों का उत्पादन भी करते हैं। खेत में गेहूं, फूल गोभी, मिर्च और सब्जियों की खेती कर रहे हैं। इसके अलावा लेसुआ के 40 पेड़ भी लगे हैं।

जितेंद्र ने बताया कि मशरूम उगाने से पहले कम्पोस्ट तैयार किया जाता है। कम्पोस्ट को तैयार करने में 25 दिन लगते हैं। इस कंपोस्ट को बैग में भरकर मशरूम के बीज डाल दिए जाते हैं। इसके बाद मशरूम तैयार हो जाते हैं। गर्मी के सीजन में मिल्की मशरूम उगाया जाता है।

यह इसके लिए उपयुक्त समय होता है। मार्च से सितंबर तक मिल्की मशरूम की खेती की जाती है। वहीं, सर्दी के मौसम में ऑयस्टर मशरूम उगाया जाता है। बाजार में एक किलो मशरूम की कीमत 300 से 400 रुपए प्रति किलो तक है। होलसेल मे यह 200 से 250 रुपए प्रति किलो तक बिक जाता है।

किसानों को मशरूम के लिए कम्पोस्ट खाद तैयार कर दिखाते जितेंद्र सांखला।

किसानों को मशरूम के लिए कम्पोस्ट खाद तैयार कर दिखाते जितेंद्र सांखला।

जितेंद्र सांखला अब सरकारी एग्रीकल्चर संस्थानों में बतौर मास्टर ट्रेनर किसानों को मशरूम की खेती की ट्रेनिंग भी देते हैं। जितेंद्र ने बताया कि मशरूम की खेती के लिए हाईजीन मेंटेन करना होता है। यह मौसम आधारित खेती होती है। यह वर्टिकल खेती है, इसके लिए बड़े खेत की जरूरत नहीं है। इसे घर, किसी हॉल, बड़े कमरे या झोंपड़े में भी तैयार किया जा सकता है।

मशरूम के फायदे

कोरोना काल के बाद मशरूम की डिमांड बढ़ी है। कारण- यह इम्युनिटी बूस्टर भोजन में गिना जाता है। आंतों को अच्छा रखता है। डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर वाले लोगों के लिए यह अच्छा माना जाता है क्योंकि यह बीटा ग्लूकन का बेहतर स्रोत है। मशरूम विटामिन डी से भरपूर होता है और इम्यूनिटी बूस्ट करता है। मशरूम में पानी, प्रोटीन, फाइबर, तांबा, पोटेशियम, सेलेनियम, ग्लूटाथियोन और विटामिन सी होते हैं। विटामिन बी 3 की अच्छी मात्रा होने के कारण यह दिल के लिए अच्छा होता है।

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71 साल के ऐसे किसान, जिन्होंने 45 साल पहले एग्रीकल्चर में बीएससी की। वक्त के साथ उन्हें समझ आया कि खेतों को रासायनिक खाद झोंककर वह मिट्‌टी की कुदरती उर्वरा शक्ति को खत्म कर रहे हैं। फिर तय किया कि खेतों में रसायनों का उपयोग पूरी तरह बंद कर देंगे। रसायनों का इस्तेमाल बंद किया तो अचानक प्रोडक्शन गिर गया। फिर खेती का तरीका बदला। (पूरी खबर पढ़ें)

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